I. घटना और प्रश्न

विस्तृत आकाश–खंडों में अनेक क्वासरों के रैखिक ध्रुवण–कोण यादृच्छिक नहीं दिखते, बल्कि “धब्बों” की तरह एक–से दिशाओं में सिमटते हैं। केवल स्थानीय कारण—एक स्रोत की चुम्बकीय ज्यामिति, जेट का मुड़ना, अग्रभूमि धूल—गीगापारसेक पैमानों पर स्थिर सह–अभिमुखता समझाने में कमजोर पड़ते हैं। इसे संयोग मानना भी उन सांख्यिकी से टकराता है जो क्षेत्रों–वार कोण–पसंद दिखाती हैं। अतः बहु–पैमानी आयोजक चाहिए, जो स्वतंत्र स्रोतों की उत्सर्जन–ज्यामिति के सन्दर्भ–ढाँचे को एक–सा करे।


II. प्रस्तावित तंत्र: तनाव–संरचना की समन्वित क्रिया

क्वासर शून्य पृष्ठभूमि में नहीं, बल्कि तनावीय कगारों और गलियारों से बुनी ब्रह्माण्ड–जाल में जड़े रहते हैं। जो स्रोत एक ही कगार/गलियारे को साझा करते हैं, वे समान ज्यामितीय बन्धनों के अधीन होते हैं: पहले प्रत्येक स्रोत के लिए कम–प्रतिबाधा वाला ध्रुवीय चैनल बनता है (जेट/विक्षेप धुरी को स्थापित करता है), फिर इन्हीं धुरियों को बड़े पैमाने पर मिलते–जुलते अभिमुखों पर “लॉक” कर दिया जाता है। ध्रुवण उस अभिमुख का दृश्य सूचक मात्र है।


III. उपमा

प्रमुख पवन–पट्टी के नीचे खेत की लहरें जैसी दशा है: हर बालि स्थानीय हवा और भू–आकृति का जवाब देती है, पर साझा “पवन–पट्टी” दूर–दूर तक एक–सी बनावट बिछा देती है। तनावीय गलियारे/कगार वही पवन–पट्टी हैं; ध्रुवण–कोण उस “कंघी” की दिशा उकेरते हैं।


IV. प्रचलित व्याख्याओं से तुलना


V. निष्कर्ष

जब ध्रुवण–संरेखण, जेट–दिशाएँ और ब्रह्माण्ड–जाल की रेशीय ज्यामिति को उसी तनाव–मानचित्र पर साथ रखा जाता है, तो दूर–दूर तक दिखती यह संगति रहस्य नहीं रहती; वह माध्यम, ज्यामिति और विकिरण की सह–मानचित्रित स्वाभाविक परिणति बन जाती है।