सूचीअध्याय 3: स्थूल ब्रह्मांड (V5.05)

परिभाषाएँ और परिमाण
हम “धागा–समुद्र–तनन” ढाँचे में संरचना-वृद्धि की कहानी बताते हैं। आद्य और बाद के युगों में सामान्य अस्थिर कण (GUP) क्षणभर बने और टूटे; उनके जीवनकालों का योग माध्यम को तनता है और स्थान–काल औसत में एक भीतरी झुकाव वाला सांख्यिकीय टेन्सर गुरुत्व (STG) आधार बैठाता है। उनके विघटन/विनाश से लौटे कमजोर तरंग-पुंज माध्यम में जुड़कर एक प्रसारी टेन्सर पृष्ठभूमि शोर (TBN) बनाते हैं। आगे हम इन्हीं पूर्ण हिंदी नामों का प्रयोग करेंगे।


I. परिदृश्य: ‘भू–आकृति’ से तनन-नियंत्रित पैटर्न तक
बड़े पायमाने पर वितरण बेतरतीब रेत नहीं है; यह एक मानचित्र जैसा है जहाँ टेन्सर भू–आकृति संगठन करती है—फिलामेंट जोड़ते हैं, दीवारें घेरती हैं, नोड उभरते हैं और रिक्तियाँ खुलती हैं। सहज भाषा में: ऊर्जा–समुद्र (Energy Sea) सतत परिवहन–माध्यम है; तनन बताता है “झिल्ली कितनी तनी है” और स्थानीय प्रसार–सीमा तय करता है; घनत्व भार की तरह भू–आकृति दबाता और उछाल देता है; ऊर्जा–धागे क्रमित प्रवाह हैं जो भू–आकृति के अनुसार समूहत और बंद होते हैं।
जल–उपमा: जल–सतह पर सतही तनन तनन का काम करता है और सतह स्वयं ऊर्जा–समुद्र है। जहाँ तनन/वक्रता बदलती है, तैरते कण आसान रास्तों से बहकर रेशे (फिलामेंट), किनारे (दीवारें) और साफ़ जगहें (रिक्तियाँ) बनाते हैं।


II. शुरुआती कदम: जब छोटी तरंगें रास्ता बनती हैं
आरम्भ में ऊर्जा–समुद्र लगभग समान था, पर बिल्कुल नहीं; सूक्ष्म ऊँच–नीच ने शुरुआती दिशा दी। तनन–ढाल ने ढलान दी; व्यतिकरण और पदार्थ नीचे फिसलना पसंद करते हैं, इसलिए सूक्ष्म–रिपल गलियारों में बढ़ती है। फिर घनत्व “ढलान को जमाता” है: स्थानीय अभिसरण घनत्व बढ़ाता है और भीतर की ओर रैम्प काटता है; चारों ओर की उछाल पदार्थ को लौटाती है और संपीड़न–उछाल का ताल बनता है।
उपमा: जल में गिरा पत्ता/कण स्थानीय तनन–वक्रता बदल देता है, हल्की संभावित ढलान बनती है जो आसपास की रेज़ाओं को खींचती है।


III. तीन भू–इकाईयाँ: गलियारे, नोड और रिक्तियाँ


IV. दो सहायक बल: भीतरी झुकाव और कोमल घिसाई


V. चार पड़ाव: तरंग से पैटर्न तक


VI. “नदी–जाल” टिकाऊ क्यों रहता है: दोहरी प्रत्यालोप


VII. बहु–मानक पदानुक्रम: फिलामेंट के भीतर फिलामेंट, दीवार के भीतर दीवार
मुख्य फिलामेंट शाखित होकर फिलामेंट और फिर रेशे बनते हैं; बड़े रिक्तियों में उप–रिक्तियाँ तैरती हैं; मुख्य दीवारों में पतली परतें और तंतु जड़े होते हैं। ताल भी संलग्न हैं—बड़े मान पर धीमे, छोटे पर तेज़। कोई स्तर बदले तो अनुमत प्रसार–सीमा के भीतर अपडेट चादर की तरह फैलता है: ऊपरी स्तर रेखांकन बदलते हैं, निचले अनुसरण करते हैं। एक ही जाल में आकार, ध्रुवीकरण और वेग–क्षेत्र सह–अभिमुख होते हैं।


VIII. आकाश में पाँच रूप


IX. गतिशील तिकड़ी: कतरनी, पुनः–जुड़ाव, लॉकिंग


X. समय–विकास: बचपन से जाल तक


XI. प्रेक्षणीय मिलान


XII. पारम्परिक ढाँचे से तालमेल


XIII. मानचित्र कैसे पढ़ें


XIV. संक्षेप में
तरंगें राह खोलती हैं; लंबी ढलानें प्रवाह संगठित करती हैं; गहरे कूप समेटकर लॉक करते हैं; रिक्तियाँ उछलतीं और साफ़ होती हैं। सांख्यिकीय टेन्सर गुरुत्व कंकाल मोटा करता है, टेन्सर पृष्ठभूमि शोर किनारे मुलायम करता है। कतरनी–पुनःजुड़ाव–जेट “संगठित–ढोना–मुक्त करना” चक्र पूर्ण करते हैं। अंतर्निहित पदानुक्रम और ब्लॉक–रीड्रॉ नेटवर्क को स्थिर और लचीला रखते हैं। सतही तनन की “लेंस” मुख्य रीढ़—ग्रेडिएंट → अभिसरण → जाल–निर्माण → प्रत्यालोप—को साफ़ करती है, साथ ही याद दिलाती है कि जल 2D इंटरफ़ेस है और ब्रह्माण्ड 3D आयतन; पैमाने/तंत्र एक–से–एक नहीं बैठते। इसी नज़र से आकाश के फिलामेंट, दीवार, नोड और रिक्तियाँ कहीं अधिक स्पष्ट दिखेंगे।


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श्रेय (सुझाव): लेखक: 屠广林|कृति: “ऊर्जा फिलामेंट सिद्धांत”|स्रोत: energyfilament.org|लाइसेंस: CC BY 4.0
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संस्करण जानकारी: प्रथम प्रकाशन: 2025-11-11 | वर्तमान संस्करण: v6.0+5.05