सूची / अध्याय 6: क्वांटम क्षेत्र (V5.05)
एकीकृत ढांचा: संग्रहित करें → पैकेट बनाएं → उत्सर्जित करें
हर प्रकाश उत्सर्जन को तीन चरणों में समझा सकते हैं।
- ऊर्जा का संग्रह (भंडार)। परमाणु, अणु, ठोस और प्लाज़्मा ऊर्जा को अधिक/कम कसे हुए तनाव-विन्यास में रखते हैं। गरमाने, विद्युत त्वरण, केंद्रित टक्करें या रासायनिक अभिक्रियाएँ विन्यास को ऊपर उठाती हैं और तनाव-भंडार बनाती हैं (उत्तेजित, त्वरित, आयनीत अवस्थाएँ)।
- पैकेट बनना (रिलीज़-सीमा पार करना)। जब आंतरिक चरण उपयुक्त क्षेत्र में आता है और ऊर्जा-सागर (Energy Sea) की सूक्ष्म तरंगें हलका धक्का देती हैं, तो तंत्र रिलीज़-द्वार पार करके तनाव की संगत आवरण में ऊर्जा पैक कर देता है — एक प्रकाश-पैकेट, जो तरंग की तरह चलता है। मुख्य बात: निर्माण दहलीज़-आधारित है। दहलीज़ से नीचे “आधा कौर” नहीं; दहलीज़ पर पूरा पैकेट—यही स्रोत-पक्ष की असततता की जड़ है।
- उत्सर्जन व प्रसार (पथ-सीमा पार करना)। दूरी तय करना पथ-दहलीज़ पर टिका है: कोहेरेंस की गुणवत्ता, पारदर्शी खिड़की में आवृत्ति, तथा उन्मुखीकरण/चैनल का मेल। शर्तें पूरी—तो दूर; नहीं—तो स्रोत के पास ही अवशोषण/तापन/प्रकीर्णन। रिसीवर (इलेक्ट्रॉन, अणु, पिक्सेल) से मिलने पर क्लोज़र-दहलीज़ भी लगती है: इसे पार करने पर ही अवशोषण/द्वितीयक उत्सर्जन माना जाता है। द्वार अविभाज्य है, इसलिए डिटेक्शन भी पैकेट-दर-पैकेट होता है।
संक्षेप में: निर्माण-दहलीज़ बताती है कैसे छोड़ा; पथ-दहलीज़ बताती है कितना दूर गया; क्लोज़र-दहलीज़ बताती है कैसे ग्रहण हुआ। यह दहलीज़-श्रृंखला तरंग-प्रसार और “हिस्सों की बही-खाता” को एक साथ बाँधती है।
“स्वस्फूर्त” क्यों होता है
- उत्तेजित अवस्थाएँ खर्चीली होती हैं: ऊँचा किया गया विन्यास अधिक तनावग्रस्त रहता है और फेज़ मुक्त-क्षेत्र के पास आते ही नीचे ढलना चाहता है।
- सागर में सदा पृष्ठभूमि-शोर (TBN) रहता है: चौड़ी-बैंड सूक्ष्म व्यतिक्षेप लगातार “द्वार खटखटाते” हैं।
- सही घड़ी में धक्का = उत्सर्जन: फेज़ तैयार और हलका धक्का मिला—दहलीज़ पार—प्रकाश-पैकेट निकल गया।
- उत्तेजित (Stimulated) उत्सर्जन बस दहलीज़ घटाता है: सम-फेज़ बाहरी तरंग फेज़-लॉक कर दहलीज़ नीचे लाती है; कई रिलीज़ पंक्तिबद्ध निकलते हैं (लेज़र)।
अतः स्वस्फूर्त उत्सर्जन = उत्तेजित अवस्था + पृष्ठभूमि-शोर + रिलीज़-दहलीज़ की सहक्रिया है।
प्रकाश की मुख्य “उत्पत्ति-शैलियाँ” (भौतिक कारण के अनुसार)
सबमें भंडार → निर्माण → उत्सर्जन समान रहता है; अंतर केवल भंडार कैसे बना, दहलीज़ कैसे पार हुई, और कौन-सा चैनल चुना गया में है।
- रेखीय उत्सर्जन (परमाणु/अणु स्तर-गिरावट)
- भंडार: इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ऊपर उठा (उत्तेजन, आयनीकरण के बाद पकड़)।
- निर्माण: फेज़ उत्सर्ज्य-क्षेत्र में; शोर धक्का देता है; संगत पैकेट बनता है; आवृत्ति आंतरिक ताल पर लॉक।
- उत्सर्जन: लगभग समदिश; रेखा-चौड़ाई जीवनकाल (कम = चौड़ी) और परिवेश-डेकोहेरेंस (टक्कर, क्षेत्र-खुरदरापन) से तय।
- विलंबित प्रकाश (फ्लोरेसेंस/फॉस्फोरेंस): मेटास्टेबल फँसाव द्वार देर तक बंद रखता है; विलंब/चैनल-प प्रतिस्पर्धा दिखती है।
- ऊष्मीय विकिरण (काला/अर्ध-काला पिंड)
- भंडार: सतह-क्षेत्र में असंख्य सूक्ष्म प्रक्रियाएँ ऊर्जा का आदान-प्रदान करती हैं।
- निर्माण: अनगिनत छोटे पैकेट ऊबड़-खाबड़ सीमाओं पर बार-बार संसाधित होकर सांख्यिकीय रूप से “श्याम” हो जाते हैं।
- उत्सर्जन: स्पेक्ट्रम तापमान से; दिशा लगभग समदिश; कोहेरेंस कम; उत्सर्जकता/ध्रुवण सतह-तनाव/खुरदरापन से प्रभावित।
- त्वरित आवेश (सिंक्रोट्रॉन/वक्रता, ब्रेम्सस्ट्रालुंग)
- सिंक्रोट्रॉन/वक्रता: मुड़ती कक्षाओं में आवेश लगातार पैकेट बनाकर छोड़ते हैं—उच्च दिशाभाव, मजबूत ध्रुवण, व्यापक पट्टी।
- ब्रेम्सस्ट्रालुंग: प्रबल कुलॉम्ब क्षेत्र में तीव्र मंदन स्थानीय तनाव-नक्शा अचानक लिख देता है और व्यापक-पट्टी पैकेट फेंकता है; घने/उच्च-Z माध्यमों में प्रबल।
- पुनर्संयोजन (मुक्त इलेक्ट्रॉन पकड़ा गया)
- भंडार: आयनिक “जेब” इलेक्ट्रॉन पकड़ती है; तंत्र अधिक तनावग्रस्त से अधिक “सुव्यय” अवस्था में आता है।
- निर्माण/उत्सर्जन: ऊर्जा-अंतर दहलीज़ पार करता है और पैकेट निकलता है।
- चिह्न: तीखी रेखा-श्रृंखलाएँ—नीहारिकाओं/प्लाज़्मा की “नीऑन लाइट”।
- विनाश (उल्टे लपेटों का खुलना)
- भंडार: स्थिर, विपरीत लपेटें मिलकर खुल जाती हैं।
- निर्माण/उत्सर्जन: लगभग पूरा भंडार दो विपरीत-दिशी पैकेटों में बदलता है (संकीर्ण पट्टी, जोड़ी-दिशा), जैसे प्रसिद्ध 0.511 MeV।
- चेरेंकोव (फेज़-वेलॉसिटी का शंकु)
- भंडार: आवेश माध्यम की फेज़-गति से तेज़ भागता है।
- निर्माण/उत्सर्जन: फेज़ शंकु के साथ “फटती” है; नीला प्रभा पैक होता है; कोण फेज़-गति से तय।
- चैनल: पथ-दहलीज़ के लगातार पार बने रहने का विशेष मामला।
- अरेखीय व मिश्रण (कन्वर्ज़न, योग/अंतर, रामन)
- भंडार: बाहरी प्रकाश-क्षेत्र ऊर्जा देते हैं; अरेखीयता उसे पुनर्वितरित करती है।
- निर्माण/उत्सर्जन: फेज़-मिलान और चैनल-संरेखण पर नई आवृत्ति वाला पैकेट (उत्तेजित या स्वस्फूर्त) निकलता है; दिशाभाव/कोहेरेंस ज्यामिति और पदार्थ-तनाव पर निर्भर।
तीन “बाह्य रूप” कैसे बनते हैं: रेखा-चौड़ाई, दिशाभाव, कोहेरेंस
- रेखा-चौड़ाई: जीवनकाल कम—आवृत्ति “पैना” करने को समय कम—रेखा चौड़ी; शोरिल परिवेश (टक्कर, खुरदरा क्षेत्र) डेकोहेरेंस बढ़ाकर चौड़ाई बढ़ाता है।
- दिशाभाव/ध्रुवण: निकट-क्षेत्र ज्यामिति और तनाव-ढाल तय करते हैं। मुक्त परमाणु लगभग समदिश उत्सर्जित करते हैं; चुंबकीय क्षेत्र/कॉलिमेटर चैनल/इंटरफ़ेस के पास उत्सर्जन बहुत दिशात्मक और ध्रुवित हो जाता है।
- कोहेरेंस: एकल रिलीज़ स्वयं संगत होती है; बार-बार पुनरसंस्करण से कोहेरेंस घटकर ऊष्मीय प्रकाश बनता है; फेज़-लॉक उत्तेजन कोहेरेंस को चरम तक ले जा सकता है (लेज़र)।
हर व्यतिक्षेप दूर तक “प्रकाश” नहीं बनता: पथ-दहलीज़ छाँटती है
- कोहेरेंस कम: आवरण जन्म पर ही टूटता है; पैकेट नहीं चल पाता।
- खिड़की अनुपयुक्त: आवृत्ति प्रबल अवशोषण पट्टियों में गिरकर स्रोत के पास मर जाती है।
- चैनल असंगत: निम्न-इम्पीडेन्स गलियारा न हो या उन्मुखीकरण गलत हो—ऊर्जा शीघ्र नष्ट।
दूरगामी प्रकाश के लिए स्वच्छ आवरण + सही खिड़की + संगत चैनल—तीनों अनिवार्य हैं।
स्थापित सिद्धान्तों से सामंजस्य
- आइंस्टीन A/B गुणांक: EFT में स्वस्फूर्तता = “शोर की दस्तक + रिलीज़-दहलीज़”, उत्तेजित = “फेज़-लॉक + घटी दहलीज़”
- क्वांटम विद्युतगतिकी: क्षेत्र-क्वांटा के परस्पर क्रिया का सूक्ष्म गणन; EFT निर्माण → पथ → क्लोज़र की पदार्थ-मानचित्र से बताती है क्यों असतत, क्यों प्रसारक्षम, क्यों प्रत्यभिज्ञेय।
- शास्त्रीय विद्युतगतिकी (“त्वरित आवेश विकिरण करता है”): EFT की भाषा में तनाव-प्राकृतिक स्थलाकृति निरन्तर पुनर्लिखित होती है—निरन्तर पैकेट-निर्माण व निर्वहन।
संक्षेप में
- स्वस्फूर्त उत्सर्जन = पृष्ठभूमि-शोर से प्रेरित उत्तेजित अवस्था दहलीज़ पार कर एक पैकेट छोड़ती है।
- प्रकाश पैकेट-दर-पैकेट आता है, क्योंकि निर्माण-दहलीज़ (स्रोत) और क्लोज़र-दहलीज़ (ग्राही) असतत बनाती हैं।
- प्रकाश का स्रोत: रेखीय, ऊष्मीय, सिंक्रोट्रॉन/वक्रता, ब्रेम्सस्ट्रालुंग, पुनर्संयोजन, विनाश, चेरेंकोव, अरेखीय रूपांतरण—एक ही तीन-चरणीय नुस्खे के अलग-अलग रूप।
- रेखा–दिशा–कोहेरेंस जीवनकाल/परिवेश तथा ज्यामिति/तनाव से तय होते हैं।
- हर व्यतिक्षेप दूरगामी प्रकाश नहीं बनता: स्वच्छ पैकेट + सही खिड़की + मेल खाता चैनल अपरिहार्य हैं।
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श्रेय (सुझाव): लेखक: 屠广林|कृति: “ऊर्जा फिलामेंट सिद्धांत”|स्रोत: energyfilament.org|लाइसेंस: CC BY 4.0
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संस्करण जानकारी: प्रथम प्रकाशन: 2025-11-11 | वर्तमान संस्करण: v6.0+5.05