प्रकाश “ऊर्जा के समुद्र” में चलने वाला व्यवधानों का एक पैकेट है। इसकी अधिकतम गति कोई एक सार्वत्रिक संख्या नहीं होती, बल्कि हर स्थान और हर क्षण वहाँ के माध्यम के स्थानीय तनाव से तय होती है। तनाव जितना अधिक होगा, स्थानीय प्रसार-सीमा उतनी ही ऊँची होगी; तनाव जितना कम होगा, सीमा उतनी ही नीची होगी। मार्ग के साथ-साथ तनाव का जैसा वितरण होगा, कुल यात्रा-समय उसी के अनुसार बदल जाएगा।

प्रयोगशाला में जब हम स्थानीय पैमाने और घड़ियाँ लेकर मापते हैं, तो ये उपकरण अपने वातावरण के साथ सह-स्केल हो जाते हैं। इसलिए पढ़ा गया मान लगभग स्थिर रहता है—इसे मापी गई प्रकाश-गति कहते हैं।

दोनों बातें साथ-साथ सत्य रह सकती हैं: स्थानीय प्रकाश-गति तनाव के साथ बदलती है, जबकि पर्याप्त रूप से स्थानीय प्रयोगों में मापी गई गति स्थिर रहती है।

दैनिक सहज बोध (सरल उपमान):

सहज निष्कर्ष एक-सा है: अधिक तनाव और अधिक तीव्र पुनर्स्थापन ⇒ तेज़ प्रसार।


I. अधिक तनाव से गति क्यों बढ़ती है (तीन सहज बिंदु)


संक्षेप में: उच्च तनाव = अधिक पुनर्स्थापन + कम विलंब + कम पार्श्व-भटकन ⇒ तेज़ प्रसार।


II. स्थानीय रूप से अपरिवर्तित, क्षेत्रों के पार परिवर्तनीय (सापेक्षता से संगति)


III. प्रयोगशाला में हमेशा वही c क्यों मिलता है


IV. आद्य ब्रह्मांड में तेज़ समानिकीकरण

मुख्य विचार: आरंभिक काल में तनाव अत्यंत ऊँचा था—ऊर्जा-समुद्र असाधारण रूप से तना था। स्थानीय प्रसार-सीमा बहुत बड़ी थी, इसलिए सूचना और ऊर्जा-व्यवधान बहुत कम समय में बहुत दूर तक पहुँच सके। ताप और विभव के अंतर तेज़ी से समतल हुए और आज दिखती बड़े-पैमाने की समानता बनी।


V. प्रेक्षणीय संकेत और तुलना (सामान्य पाठकों के लिए)


VI. संक्षेप में